आज मैं एक संकल्प के साथ उठता हूँ—
मैं आज का दिन पूरे बोध में जीऊँगा।
कल की स्मृतियाँ और कल की चिंताएँ दोनों को अभी के क्षण के बाहर रख दूँगा।
क्योंकि जीवन न तो बीते कल में घट रहा है, न आने वाले कल में; जीवन तो इसी क्षण में साँस ले रहा है।
मेरे लिये
मेरे लिये बोध का अर्थ है—
मैं क्या सोच रहा हूँ,
क्या महसूस कर रहा हूँ,
क्या कर रहा हूँ—
इन तीनों के प्रति जागरूक रहना।
मैं मशीन की तरह नहीं, इंसान की तरह जिऊँ।
जैसे कोई दीपक अँधेरे कमरे में रखा हो—
वह शोर नहीं करता, कुछ कहता नहीं, बस रोशनी देता है।
बोध भी वैसा ही है।
वह मुझे मेरे भीतर और बाहर दोनों को देखने की क्षमता देता है।
मैं सुबह उठता हूँ, तो सबसे पहले अपने शरीर को महसूस करता हूँ।
मैं साँस लेता हूँ—गहरी, शांत।
मैं देखता हूँ कि मेरा मन कहाँ है—कहीं भाग तो नहीं रहा?
जैसे घोड़े को चलाने से पहले लगाम कसनी पड़ती है,
वैसे ही दिन शुरू करने से पहले अपने मन को थामना पड़ता है।
आज मैं जल्दबाज़ी में नहीं उठूँगा।
आज मैं “उठना” नहीं, “जागना” चुनूँगा।
छोटे-छोटे क्षण, बड़ा बोध देते हैं
जब मैं चाय पीता हूँ, तो सचमुच चाय पीता हूँ।
न मोबाइल, न खबरें, न काम की लिस्ट।
मैं कप की गर्माहट महसूस करता हूँ,
चाय की खुशबू पहचानता हूँ,
और हर घूँट के साथ वर्तमान में लौट आता हूँ।
यह कोई साधु होने की बात नहीं है, यह सजग इंसान होने की बात है।
आज मैं लोगों को सुनूँगा—वास्तव में सुनूँगा।
उत्तर देने के लिये नहीं, समझने के लिये।
अक्सर हम सामने वाले के बोलते समय ही अपने जवाब तैयार कर लेते हैं।
आज मैं ऐसा नहीं करूँगा।
जैसे साफ पानी में चेहरा साफ दिखता है,
वैसे ही शांत मन में सामने वाला व्यक्ति स्पष्ट दिखता है।
अगर आज मुझे गुस्सा आएगा—तो मैं पहले उसे पहचानूँगा।
मैं कहूँगा: “हाँ, यह क्रोध है।”
मैं तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दूँगा।
मैं क्रोध और अपने कर्म के बीच थोड़ी सी जगह बनाऊँगा।
यही जगह मेरी स्वतंत्रता है।
जैसे ब्रेक लगे बिना गाड़ी दुर्घटना कर देती है, वैसे ही बोध के बिना मन संबंध बिगाड़ देता है।
आज मैं काम को बोझ नहीं मानूँगा।
मैं काम को साधना बनाऊँगा।
मैं जो कर रहा हूँ, पूरा ध्यान उसी पर रहेगा।
आधा मन यहाँ, आधा कहीं और—इस आदत को आज मैं विराम दूँगा।
दिन के अंत में मैं स्वयं से पूछूँगा:
क्या मैं जागकर जिया?
क्या मैंने अपने भीतर और बाहर दोनों को देखा?
कहाँ मैं बह गया,
और कहाँ मैंने खुद को थाम लिया?
मैं खुद को दोष नहीं दूँगा।
मैं सीखूँगा।
जैसे बच्चा गिरकर चलना सीखता है, वैसे ही मैं चूककर बोध सीखता हूँ।
आज मैं पूर्ण नहीं बनूँगा, पर सजग रहूँगा।
आज मैं महान नहीं बनूँगा, पर ईमानदार रहूँगा।
आज मैं सब कुछ नहीं बदलूँगा, पर स्वयं को थोड़ा सा जाग्रत करूँगा।
और यही पर्याप्त है।
मैं आज का दिन पूरे बोध में जीऊँगा—
क्योंकि यही मेरा जीवन है, और यही मेरा समय है।
