आज के दिन
मुझे अपनी देह पर ध्यान देना है
अपनी देह के संवेदनों को समझना है,
मेरी देह मुझसे कुछ कहती है,
अपनी दशा अपनी जरूरतों से आगाह करती है,
देह एक अनंत यात्रा नहीं है,
उम्र बढ़ रही है देह झर रही है
धड़कनें अनियमित होकर, नब्ज़ तेज़ होकर,
साँसे भरकर अपना हाल बताती हैं
लहू उबाल मारता है, पसीना जबीं पर आता है,
देह यष्टि ताप उगलती है,
चेहरे में हर बरस झुर्रियां उभरती हैं
अंग फड़कते हैं, कानों में पत्ते खड़कते हैं,
रातों की नींद, दिन का सुकून जाता रहता है
अच्छा तैराक उम्र के बहाव में जा बहता है
देह से ही सब सुख, लुत्फ, मज़ा है
बीमार देह लिए फिरना एक सज़ा है
मुझे खान पान, नींद आराम, पोषण सबका
ध्यान रखना है,
ये शरीर किसी दुश्मन की जागीर नहीं
बल्कि घर अपना है
अपनी सेहत को लेके गलतफहमी नहीं पालनी है
अपनी देह की पुकार अनसुनी कर नहीं टालनी है
देह सारी कल्पना, हर एक सपना साकार करने
अपने अस्तित्व में रंग भरने ज़रूरी है
देह के बिना आत्मा भी अधूरी है
अपनी देह की हर एक गांठ खोलनी है
हर चीज़ सेहत के तराजू पर तोलनी है
ख़्वाब ज़्यादा हैं कि उम्र कम न पड़ जाए
बदन के पेड़ पर जल्दी न आ पतझड़ जाए
इस नेमत का हरदम ख्याल रखना है
अपनी देह के मौन संवाद संकेत सुनना है
@मन्यु आत्रेय
Sach hai sir 💐💐sahi likha hai aapne 👍..take care.
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