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Thursday, 7 January 2021

हर बात को सम्मान का प्रश्न मत बना लेना


नव कल्प
आज के दिन 
मुझे यह समझ लेना है कि
हर एक मुद्दे को सम्मान का प्रश्न बनाने की जरूरत नहीं है 
जो हर बात को अपने सम्मान से जोड़ देता है 
वह सबसे ज्यादा अपमानित भी होता है 
कोई बात आप के सम्मान का विषय है या नहीं 
यह आपको तय करना है 
दूसरों के नियंत्रण में यह कभी न रखें कि
कौनसा मुद्दा आपके सम्मान से जुड़ा है 
और कौनसा नहीं जुड़ा है
कई बार लोग हमें उकसाते हैं 
और हमें कुछ ऐसे संघर्षों में डाल देते हैं
जिनमें पड़ने की हमें जरूरत ही नहीं होती 
छोटी छोटी सी बातों को अपने सम्मान का प्रश्न बनाकर 
हम रिश्तो को कमजोर करते जाते हैं और 
एक दिन अच्छे रिश्तो को भी खो देते हैं 
सम्मान का प्रश्न संक्रामक होता है 
जैसे ही आप किसी बात को अपने सम्मान का प्रश्न बना लेते हैं 
तो ना चाहते हुए सामने वाला भी 
उसे अपने सम्मान का प्रश्न बनाने के लिए मजबूर हो जाता है 
और इससे आपसी संघर्ष और विवाद बढ़ता जाता है 
क्योंकि दोनों पक्ष अपने आप को सही मानते हैं 
यह लड़ाई लंबी चलने लगती है जीवन की शांति भंग हो जाती है 
किसी भी बात को सम्मान का प्रश्न बनाने से पहले अपनी समीक्षा करनी है 
कि क्या यह मुद्दा मेरे लिए उतना ज़रूरी है? 
क्या इस पर प्रतिक्रिया देने का सिर्फ यही एक तरीका है? 
हर रिश्ते में हमें थोड़ी-थोड़ी मात्रा में अपमान सहना पड़ता है और हम बुरा भी नहीं मान सकते 
इसी से उस रिश्ते की नींव मजबूत होती है
कि आप सामने वाले की बातों को कितना सहन कर पाते हैं 
हालांकि इसकी अपनी एक सीमा होती है 
उसके बाद आपको जवाब देना ही पड़ता है
कोई बात सिर्फ इसलिए मेरे लिए सम्मान का विषय नहीं होनी चाहिए 
कि इससे मेरे अहम, मेरी धारणाओं मेरे पक्ष को चोट पहुंचती है 
जब कोई विषय आपके मन और आपकी बुद्धि को अपमान की बात लगे 
जिसे आपकी आत्मा भी अपमान स्वीकार करे 
सिर्फ उसे ही अपने सम्मान से जोड़िए
क्योंकि सम्मान पर लगी हुई चोट बरसो तक सालती रहती है अगर माकूल जवाब न दिया जा सका

@मन्यु आत्रेय

4 comments:

  1. Bahut gahan vichar sir 👍🙏🏻🙏🏻💐💐

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  2. A very experienced thought article. Not just family bickering if such moral education continues from childhood or ever

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  3. 🙏श्री मान जी शुभ प्रभात, अब भी कोई मनुष्य निस्वार्थ भावना से प्रभावित होकर अपने कर्तव्य क्षेत्र में निष्ठापूर्वक अच्छी व अधिक कार्य करता है तब स्वभाविक रूप से उनके मन में सम्मान प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न होने लगता है और वह उसका अधिकार रखता है लेकिन ऐसा नहीं होने की स्थिति पर धैर्य रखना पुरुष का पुरुषार्थ माना जाता है लेकिन किसी के दम्भ या घमंड पर अपना हार स्वीकार करना कायरता का परिचायक हैं।

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