नव कल्प
हम में से अधिकांश लोग किसी के प्रभाव में होते हैं, लेकिन कुछ लोग बुरी तरह से किसी के प्रभाव में होते हैं, किसी के चंगुल में फंसे होते हैं।
किसी के प्रभाव में होना उतना बुरा नहीं है जितना किसी के चंगुल में होना क्योंकि इसका मतलब है फंसा हुआ होना।
कई बार उन्हें पता नहीं होता कि वो किसी के चंगुल में हैं, तो कभी वे उस चंगुल से निकलने के लिए छटपटाते रहते हैं।
कभी हम किसी दूसरे इंसान के चंगुल में होते हैं तो कभी परिस्थितियों के और कभी खुद अपने व्यक्तित्व, व्यवहार और सोच के।
चंगुल से निकलने का सबसे पहला कदम है अपनी स्थिति को समझना,
अपने अहम को किनारे रखकर यह स्वीकार कीजिये कि आप किसी के चंगुल में हैं, और आपको किसी भी दशा में उससे बाहर निकलना है
आप यह देखिए कि सामने वाले व्यक्ति का हस्तक्षेप और प्रभाव आपके जीवन के किस किस क्षेत्र में है, वो किस प्रकार से आपकी भावनाओं, आपके विचारों, आपके आत्मबल, आपके निर्णयों और आपकी गतिविधियों को प्रभावित करता है
आप ये समझने की कोशिश कीजिये कि आपकी वो कौन सी कमियां कौन सी मजबूरियाँ और कौन सी परिस्थितियां हैं जिनके कारण आप उसके कब्जे में हैं
बिना सामने वाले को पता चले, अपनी एक एक निर्भरता या मजबूरी को दूर कीजिये। यदि आप भावनात्मक रूप से बहुत ज़्यादा आश्रित हैं तो मन को कड़ा कीजिये और उन लोगों से जुड़िये जो आपको भावनात्मक रूप से संबल दे सकें।
यदि पैसों से मजबूर हैं तो पैसे बचाइए, कमाइए, बढ़ाइए, शारीरिक रूप से निर्भर हैं तो विकल्प तलाशिये। बेसहारा हो जाने के डर को खत्म कर लीजिए। अपनी स्थिति को अंदर ही अंदर मज़बूत कीजिये। ऐसे लोगों से संबंध बढ़ाइए जो वक़्त पड़ने पर आपके साथ खड़े हो सकें।
सामने वाले के हर एक तार को काटिये जिससे वो आपको नियंत्रित करता है
जब आपके भीतर आत्मबल आ जाये तब उसके द्वारा थोपे जाने वाले निर्णयों को अस्वीकार करना शुरू कीजिए।
अपनी पसंद नापसंद को महत्व देना शुरू कीजिए। अपने काम को अपनी पहचान बनाइये।
सामने वाले के प्रभाव का दायरा सीमित करते चलिए लेकिन जब तक आप पूरी तरह से तैयार न हो जाएं उसे चुनौती या चेतावनी मत दीजिए अन्यथा वह सतर्क होकर आपको फांसने की कोशिश में जुट जाएगा।
उससे संपर्क और संवाद धीरे धीरे कम कीजिये। अपने मनोभाव, योजनाएं, इच्छाएं, ज़रूरतें, दूसरों से अपने संबंधों को उसे मत बताइये। हो सकता है अपने चंगुल से आपको निकलता देख वह कोई भावनात्मक नाटक करे, डराए, धमकाए, लालच दे, घेरने की कोशिश करे, लेकिन आपको अडिग रहना होगा। उसके हर संभावित उपाय को सोच समझ कर रख लीजिए ताकि उससे प्रभावित न हो पाएं। हिम्मत बना के रखिये। ये जीवन आपका अपना है, इसे गुलामी में मत काटिए। स्वतंत्र जीवन जियें। दूसरों के चंगुल से बाहर निकलिए।
@मन्यु आत्रेय
👌👌👌💐💐💐
ReplyDeletevery well explained sir👌🙏💐
ReplyDeleteBahut khoob sir... behtareen 👌👌👌💐💐💐
ReplyDeleteश्री मान जी शुभ प्रभात, 🙏🌹🌺🌹🙏 कर्तव्य, व्यवहार, स्वार्थ, परमार्थ सब अपनी-अपनी जगह सही है, गीता में से अर्जुन को भी व गांधी जी को भी कुछ मिल गया और अन्य लोगों को भी। बस विचारों के अंतर है।
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