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Monday, 15 March 2021

क्या आप भी इस तरीके से सोचते हैं?

हर आदमी को अपनी सोच तब तक सही लगती है 
जब तक कि उसकी सोच ग़लत नहीं साबित हो जाती। 
हमें पता नहीं चलता लेकिन हमारी सोच ग़लत हो जाती है, 
हमारे सोचने की शुरूआत ही या तो ग़लत होती है या फिर
बीच में कहीं से हम ग़लत सोच की ओर लुढ़क जाते हैं। 
हम शुरूआत से ही सिर्फ और सिर्फ नकारात्मकता में सोचते हैं,
'सब कुछ खत्म हो गया है, मैं किसी लायक नहीं,
'कोई भी मुझे प्रेम नहीं करेगा' जैसे विचार मन में लाते हैं।
कभी कभी हमारे जीवन में जो सकारात्मकता बची हुई होती है 
उसकी ओर ध्यान न देकर हम सिर्फ उन बातों पर ध्यान देते हैं 
जो नकारात्मक हैं, जो अच्छी नहीं हैं, जो अस्वीकार्य और अप्रिय हैं। 
कभी कभी हम आर या पार की सोच मन में लाते हैं, या तो ये है या फिर नहीं है। 
यानी हम सिर्फ दो ध्रुवों में बांट कर सोचते हैं, 
होगा-नहीं होगा, अच्छा-बुरा, सही-गलत, हाॅं-ना आदि। 
हम ये नहीं सोचते कि इसके बीच में भी काफी कुछ संभावना हो सकती है। 
कई बार हम किसी भी बात का सामान्यीकरण कर देते हैं। 
एक ही बात को सभी लोगों पर और हर कालखंड पर लागू करके सोचने लगते हैं।
 "हमेशा ऐसा ही होता है, हर कोई ऐसा ही करता है," ऐसे सोचते हैं। 
हम कई बार तार्किक क्षमता और सत्य की परख करने वाली 
बौद्धिकता को परे रखकर सीधे निष्कर्ष पर कूद जाते हैं। 
हम दूसरी बातों पर विचार नहीं करते और सीधे ’ऐसा ही है’ पर आ जाते हैं। 
सच को जानने का प्रयास ही नहीं करते। 
कई बार हम उन बातों के लिये भी खुद को दोषी मानने लगते हैं 
जिन पर हमारा कोई नियंत्रण ही नहीं होता, 
उन घटनाओं के लिये भी स्वयं को आरोपित करते हैं 
जिनमें हमारी कोई भूमिका ही नहीं होती। 
ऐसा कई बार होता है कि हम 'इमोशनल फूल' बन जाते हैं, 
भावनात्मक तर्क के आधार पर 
किसी एक बात को ही अपने लिये प्रामाणिक मान लेते हैं 
और अपना ही दमन करने लग जाते हैं, 
जैसे अपने बारे में यह राय बना लेना
कि चूंकि मैं सुंदर नहीं हूॅं इसलिये मैं अनाकर्षक हूॅं। 
भावनात्मक तर्क सच्चाई का प्रमाण नहीं होते हैं। 
कभी कभी हमारे तुलना करने का तरीक़ा गलत होता है 
हम दूसरों की सिर्फ अच्छी और सकारात्मक बातों की तुलना 
अपनी सिर्फ नकारात्मक और बुरी बातों से करते हैं। 
दूसरों की अच्छाई और अपनी बुराई को कई गुना करके देखने लग जाते हैं। 
हम कई बार खुद पर काफी ज़्यादा अपेक्षायें लाद लेते है 
और खुद को बहुत ही दबाव में ले आते हैं, धीरे धीरे अवसाद में चले जाते हैं। अवास्तविक अपेक्षायें लादने से बड़ा धोखा कोई खुद को क्या देगा? 
यदि आपके सोचने का तरीका भी ऐसा है तो सजग हो जाईये 
क्योंकि आप ग़लत और अस्वस्थ तरीके से सोच रहे हैं, 
इसमें अविलंब सुधार की ज़रूरत है।

@ मन्यु आत्रेय

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