रिश्तों को अगर किसी चीज़ से सबसे अधिक नुक़सान पहुंचता है तो वह है अहम की लड़ाई।
दो लोग जब अपने रिश्ते को अपने विचारों के केंद्र में रखते हैं तो रिश्ता मज़बूत होता है,
परंतु जब वही लोग अपने अपने विचार, प्राथमिकताओं, ज़रूरतों
और अहंकार को रिश्ते के बीच में ले आते हैं तो रिश्ता कमज़ोर हो जाता है।
जिसका अहम जितना ज्यादा प्रबल होता है वह उतना ज्यादा चोटिल होता है।
छोटी छोटी बातें, भीतर तक गहरा वार कर जाती हैं ।
अहम में आप अपने आप को बाक़ी सबके ऊपर रखने लग जाते हैं।
अगर सामने वाला आपके सामने झुक जाता है तो इसका अर्थ है
उसने अपने ऊपर अपने रिश्ते को रखा है, आपको रखा है
आप अहम की लड़ाई में जीतकर भी रिश्ते की लड़ाई हार सकते हैं।
अक्सर रिश्ते को बचाने के लिए एक को अपने अहम की कुर्बानी देनी पड़ती है
आप इसे अहम कह लें या स्वाभिमान।
जब एक ही पक्ष को लगातार झुकना पड़े, तो उसका दमन हो जाता है,
उसका आत्मबल कमज़ोर हो जाता है,
एक सुंदर रिश्ते को कुचल दिया जाता है।
आपको पता नहीं चलता लेकिन लोग रिश्ते निभाते हुए दूसरों के अहम को
बढ़ाते चलते हैं, उनका दुर्व्यहार सहते हैं, उन्हें अवांछित प्राथमिकता देते हैं
उन्हें उनकी पात्रता से बढ़कर सब कुछ देते हैं इससे सामने वाला स्वयं को
वह सब पाने का हक़दार और आपको देने के लिए बाध्य समझता है।
बाद में जब आप किसी मौके पर वह उसे नहीं दे पाते तो उसका अहम चोटिल हो जाता है।
वह नाराज हो जाता है, आपका अपमान करने लगता है, आपको मजबूर करने लगता है,
अहम वो नाग है जिसके सामने जितना सर झुकायेंगे वो उतना फन फैलाता है।
बहुत बार आदमी ज़िद पर आ जाता है और फिर रंग बदरंग होते देर नहीं लगती।
जब आपको हर मामले में सामने वाले की गलती दिखे,
जब आपको उस पर क्रोधित होने का सही कारण समझ नहीं आ रहा हो
जब आप शांति से सोचने की बजाए उग्र होकर सोच रहे हों,
जब विचार तर्क सम्मत न होकर ज़िद्द पर टिक गए हों
तो समझिए आप अहम की ज़िद लेकर चल रहे हैं।
ज़िद में आकर आदमी गलत निर्णय लेता है, सब कुछ बर्बाद करने पर तुल जाता है।
आसानी से विघ्न संतोषी लोगों के हाथों की कठपुतली बन जाता है।
एक रिश्ते में शुरू से ही सामने वाले को उस रिश्ते से ज़्यादा बड़ा महसूस नहीं कराना चाहिए,
बहुत ज़्यादा विशिष्ट अनुभव नहीं कराना चाहिए
अन्यथा उसकी अपेक्षाएं बढ़ती जाती हैं और उसे जब आप पूरा नहीं कर पाते तो
सामने वाला आप में अपराध बोध भर देता है या आप आत्म वंचना के शिकार हो सकते हैं।
रिश्ते बचाने के लिए किसी के भी अहम को पोषित नहीं करना चाहिए।
बल्कि उस रिश्ते की जो सबसे खूबसूरत बात हो सकती है जैसे कि,
परस्पर सहयोग, भरोसा, सम्मान, एक दूसरे की परवाह, स्नेह और प्रेम आदि
उनको बढ़ावा देना चाहिए, तब ही रिश्ता मज़बूत बनता है।
लोक व्यवहार और रिश्ते निभाना अक्सर आदमी को कष्ट देता है।
वही तो कीमत है सुंदर रिश्तों की, आप अपने आप पर किसी व्यक्ति
किसी संबंध को प्राधान्य दे रहे हैं अपनी ओर से इस रिश्ते में कुछ निवेश कर रहे हैं।
इसलिए अहम को तोड़ना हमेशा बेहतर होता है। अपना अहम छोड़ना और सामने वाले को उसके अहम से बाहर आने में मदद करना
एक रिश्ते में आबद्ध दो लोगों को और भी ज़्यादा मजबूती से जोड़ देता है।
इसलिए अहम छोड़ो,रिश्ते जोड़ो।
@ मन्यु आत्रेय
Vary true💐💐👌👌
ReplyDeleteI think Indian men should read this..
ReplyDeleteYour views or the MIRROR u shows 2 we common peoples is soooooooooo... soft,Clean n clear sir, marvelous
ReplyDeleteश्री मान जी शुभ प्रभात, रिस्तों में विश्वास, प्रेम, सहयोग अपनापन का समावेश होता है, यदि स्वार्थ, लालशा, अपेक्षा, उपेक्षा होना प्रारंभ होता है तब आपसी सामंजस्य स्थापित कर मनभेद या मतभेद को दूर किया जाना चाहिए ताकि आगामी समय में सच्चा रिस्ता बना रहे। अपने तो अपने होते हैं रिस्ता दिखावा या आडम्बर नहीं होता है बल्कि एक एहसास करने की क्रिया हैं और केवल अपनों के दुर जाने या साथ रहने पर ही होता है।
ReplyDeleteअनुभव का निर्माण
ReplyDeleteनहीं हो सकता
इसे समय देकर ही
पाया जा सकता है
सलाह हारे हुए की
तजुर्बा जीते हुए का
और दिमाग खुद का
इंसान को जिंदगी में
कभी हारने नहीं देते.
🙏सुप्रभात🙏
Bahut sahi sir .. perfect this is 👌👌👌💐💐💐🙏🙏
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