आज कुछ देर शांत बैठकर आप ये हिसाब लगाइए कि आपके जीवन में
किन किन बातों का दुख है किन किन बातों का दर्द है
कौन से दुख दर्द आवश्यकता और तीव्रता से अधिक आपने ढोये हैं?
आपको दुखों से उबरने की राह मिल जाएगी।
दुख और दर्द की कोई चाहे जैसी परिभाषा दे ले
आप भली भांति जानते हैं कि दुख क्या है, दर्द क्या है?
मन के प्रतिकूल कुछ भी घटने से जो नकारात्मक मनोभाव हममें पैदा होते हैं
जैसे खिन्नता, अप्रसन्नता, क्रोध उनके मूल में कहीं न कहीं दुख दर्द होता है।
दुख और दर्द जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं।
जन्म से लेकर मृत्यु तक हमें हज़ारों दुखों और दर्द का सामना करना पड़ता है।
कुछ दर्द क्षणिक होते हैं, कुछ थोड़े समय रहते हैं, कुछ लंबे समय रहते हैं
वहीं कुछ दुख कुछ दर्द सारी ज़िन्दगी रहते हैं।
पहले तो हम उस दुख उस दर्द को स्वीकार ही नहीं कर पाते
लेकिन बाद में हमें उसे स्वीकार करना ही पड़ता है धीरे धीरे हम उनके आदी होते चले जाते हैं।
जैसे जैसे हम आदी होते जाते हैं वैसे वैसे उस दर्द उस दुख से 'एडजस्ट' करने लग जाते हैं।
और हम उनके बीच जीना सीख जाते हैं, यही जिंदगी की सच्चाई है।
आदमी बड़े से बड़े दुख को झेल जाता है, सह जाता है, बशर्ते वह उसे स्वीकार कर ले।
तकलीफ तब सबसे ज़्यादा होती है जब हम उस दुख उस दर्द को स्वीकार नहीं कर पाते।
जब तक हम स्वीकार नहीं करते तब तक वह आंच पर चढ़े दूध की तरह उफनता रहता है।
जो सच है उसे तो स्वीकार करना ही पड़ता है।
ये बात सही है कि किसी भी दुख को एकदम से स्वीकार कर पाना कठिन होता है,
आदमी तुरंत किसी दर्द को स्वीकार नहीं कर पाता,
स्वीकार न करते हुए भी उसका अस्तित्व उसी दुख उसी दर्द के आस पास आकर थम जाता है।
आप जाने अनजाने उस दुख दर्द को सींचते रहते हैं
वो और सघन होता जाता है।
अपने दुख दर्द ज़्यादा लोगों को बताने नहीं चाहिए
क्योंकि लोग जानकर समझकर भी कोई खास मदद नहीं कर पाते
बल्कि हमारे दुश्मन हमारे दुखों को जानकर खुश होते हैं,
विघ्न संतोषी लोग हमारे दुखों की जड़ को सींचते हैं और उन्हें कभी समाप्त नहीं होने देते।
अपने दुख दर्द का प्रदर्शन कभी मत कीजिये अन्यथा तमाशा बन जाता है।
उन लोगों को पहचानिये जो आपको दुखी करते हैं उनसे अपने संबंधों अपने नियंत्रण की सीमा पहचानिये,
उन परिस्थितियों को पहचानिये जिनके चलते आप दुखी होते हैं
अपने व्यक्तित्व के उन आयामों को पहचानिये जो बार बार आपको ऐसी स्थिति में उलझाते हैं
कि आपके हिस्से में सिर्फ दुख दर्द आता है। उनसे दूरी बढ़ाइए और स्वीकार कीजिये जो कुछ आपके नियंत्रण में नहीं है,
अपने नियंत्रण का दायरा धीरे धीरे बढ़ाया भी जा सकता है।
असल मे सुख दुख का बहुत संबंध हमारे मन से होता है।
जिसका मन जितना ज्यादा कोमल, सरल, कमज़ोर और आग्रही होता है
वह अपने मनोलोक में ही जीता है, उसे उतनी तकलीफ पहुंचती है
उसके हिस्से में उतने दुख उतने दर्द आते हैं
इसलिए मन को थोड़ा कड़ा कीजिये,मन को थोड़ा वास्तविकता के धरातल पर लाइये।
अपने असली दुख दर्द और ओढ़े गए दुख दर्द में अंतर कीजिये और हर बोझ को उतार फेंकिये।
धीरे धीरे आप हर दुख दर्द से उबर सकते हैं।
@मन्यु आत्रेय
sirji u make clear our veiw..thank u..
ReplyDeletevery good morning
Vary nice 💐💐
ReplyDeleteBahut khoob sir 👌👌👌💐💐very important observation
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