body {-webkit-user-select:none; -html-user-select:none; -moz-user-select:none; -ms-user-select:none; user-select:none;}

Friday, 29 November 2024

मेरी अधूरी प्रेम कहानी


@ मन्यु आत्रेय


एक उम्र में आंखों में हसरत थी, 

ज़िंदगी की राहों में आखें बिछाये बैठा था कि कोई तो हो जिसे आखों में बसा सकूं। 

आंखें थकने लगी थी कि तभी किसी से आंखें चार हो गई और वो आंखों में उतर गई। 

आंखों की भाषा आखें पढ़ने लगी। दिन रात आंखों ही आंखों में कटने लगे। 

लेकिन पता नहीं था कि कोई हम पर आंखें गड़ाये बैठा है। मैं किसी की आंखों का कांटा बन गया हूॅं। 

प्रेम में आंखों पर ऐसा परदा पड़ गया था कि समझ ही नहीं आया कि वो धीरे धीरे आंखें फेरती जा रही थी। 

अब वो मुझसे आंखें चुराने लगी थी। 

वो खुद किसी और की आंखों में गड़ गई थी, उसकी आंखें फिर किसी और से चार हो गई थी। 

बड़ी होशियारी से वो मेरी आंखों में धूल झोंक रही थी। 

उसकी आंखों का तो पानी ही मर गया था लेकिन मैं प्रेम में आंखों का अंधा बना रहा।

मैं जो उसकी आंखो का तारा था, कब उसकी आंख की किरकिरी बन गया समझ ही नहीं आया। 

जिसे मैंने आंखों पर बिठाया था वो बात बात पर मुझे आंखें दिखाने लगी थी, 

छोटी सी चूक पर भी आखें लाल पीली करके देखती थी। 

उसे देखने के इंतज़ार में आंखें थकने लगी थी। 

आंखों में तेल डालकर मैं उसकी प्रतीक्षा करता रहा। 

उसकी आंखों में चर्बी छा चुकी थी, अब वो कहीं और आंखें सेंक रही थी। 

मैं फिर भी खुश था कि कम से कम उसकी आंखें तो ठंडी हो रही हैं। 

मेरी वफ़ा और उसकी जफ़ा में आंख मिचोली चल रही थी। 

आखि़रकार उसने मुझे आंख में पड़े तिनके सा अपने जीवन से निकाल दिया। 

मेरी आंखें रह रह कर भर आती। 

आखें मूँद लेने का ख़्याल मन में आ जाता, कभी लगता कि आंखें बंद ही हो जातीं। 

मेरी ग़लती सिर्फ़ यही थी कि उस पर आंखें मूंद कर भरोसा किया,

 उसे आंखों की पुतली बनाये रखा, उस पर आंखें नहीं रखी। 

मगर इस धोखे के बाद मेरी आंखें खुल गई और मेरी आंखें पत्थर हो गई  

मैंने ठान लिया था अब इन आंखों में कोई नहीं बसेगा।

मगर कुछ दिनों बाद जब आँखों का पानी जम गया 

किसी और से मेरी आँखे चार हो गई.


Thursday, 28 November 2024

दख़लंदाज़ी या हस्तक्षेप कैसे पहचानें?


हस्तक्षेप और दख़लंदाज़ी से जुड़ी कुछ बातें
 


@ मन्यु आत्रेय 

 जब कोई आपके कामों में या जीवन में गै़र ज़रूरी अनाधिकृत दख़लंदाज़ी करता है तो आपको यह महसूस होता है-

  1. उस व्यक्ति की उपस्थिति आपको असहज और बेचैन कर देती है। 
  2. आप उसके सामने बंधे हुए और मजबूर महसूस करने लगते हैं। 
  3. आपके मन में अचानक तनाव आ जाता है। घबराहट होने लगती है। 
  4. आपके अंदर भावनाओं का नकारात्मक द्वंद्व पैदा हो जाता है। 
  5. आप जल्दी से जल्दी उस व्यक्ति और माहौल से दूर हो जाना चाहते हैं। 

कैसे जानें कि कोई दखल दे रहा है ?

            कई बार लोग अप्रत्यक्ष रूप से भी आपके मामलों में दख़ल दिये होते हैं और आप पहचान नहीं पाते। तो आप कैसे पहचानेंगे कि कोई आपके मामले में दख़ल या हस्तक्षेप कर रहा है? 

  1. कोई हमें बिना मांगे सलाह देने लगता है उसका स्वर आदेश जैसा होता है। 
  2. वो हमारे दायरे का उल्लंघन करने वाले सवाल, काफ़ी सवाल पूछता है।  
  3. कुछ लोग हम पर अवांछित अधिकार जमाते हैं। जितना उनका हक़ या पात्रता बनती है उससे ज़्यादा वे हक़ दिखाते हैं। 
  4. जब कोई हमारे फै़सलों में गै़र ज़रूरी रूप से शामिल होने की कोशिश करता है या हमें उसके हिसाब से निर्णय लेने के लिये प्रेरित करता है। 
  5. कभी कभी कोई व्यक्ति अपनी आशा, अपेक्षा, इच्छा या इंसानियत की दुहाई देकर हमसे अपनी मनमर्जी का व्यवहार करवाना चाहता है। 
  6. ऐसे लोग हममें अपराध बोध, क्रोध या आत्म दया पैदा करके हमें अपने नियंत्रण में लेने का प्रयास करते हैं। 
  7. कोई क्रोध में, तैश में या हमें नीचा दिखाते हुए सारी कमान अपने हाथ में लेने की कोशिश करता है जबकि वो काम हमें करना चाहिये था। 
  8. कुछ लोग यह दर्शाते हुए कि हम कम जानते हैं और वे ज़्यादा जानते हैं, हावी होने की कोशिश करते हैं। उनके शब्दों और गतिविधि से समझा जा सकता है। 
  9. जो लगातार केवल नकारात्मक बातों, कमियों, चूकों को लेकर आलोचना के स्वर में बातें करता है वो भी दखलंदाज़ी कर रहा होता है। 
  10. जो हमारे विकल्प के सामने अनावश्यक रूप से कई कई विकल्प प्रस्तुत करने की कोशिश करता है, वह अप्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप करता है। 
  11. कभी कभी कोई व्यक्ति हम पर हद से ज़्यादा निर्भरता जताने लगता है। 
  12. कुछ लोग हमारे बारे में अफ़वाहें फैलाते रहते हैं, गॉसिप करते हैं और हमारे मामले का तमाशा बनाने की कोशिश करते रहते हैं, कई बार हमें ये पता नहीं होता कि कौन ऐसा कर रहा है। 
  13. कुछ लोग ड्रैकुला की तरह हमसे हमारा आशावाद, सकारात्मकता और उत्साह चूस लेते हैं और हमें किसी ड्रामा में उलझा देते हैं। 
  14. जिस समय आपका कुछ महत्वपूर्ण काम हो उसी समय वे कुछ ध्यान बंटाने वाली गतिविधि कर देते हैं या फिर तमाशा खड़ा कर देते हैं। 
  15. कुछ लोग सीधे तौर पर तो नहीं लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से अपनी नकारात्मकता फैलाते रहते हैं, कभी व्यंग्य करके, कभी टीका टिप्पणी करके वे हमें प्रभावित करते हैं। 
  16. लोग दख़लंदाज़ी क्यों करते हैं?
  17. हर व्यक्ति के दखल देने के अलग अलग कारण हो सकते हैं, कभी यह स्वभाव का भाग हो सकता है तो कभी किसी मक़सद से हो सकता है, कभी कभी व्यक्ति को समझ नहीं आता कि वह दूसरे के मामले में दख़ल दे रहा है। \

इन कारणों से लोगों का दख़ल हो जाता है-

  • जब कोई स्वयं को आपका हितैषी मानता है, आपसे जुड़ा हुआ महसूस करता है तो वो आपके मामले में दख़ल देने का अधिकार समझने लगता है। 
  • ऐसा व्यक्ति आपको कोई ग़लती या चूक करने से रोकने के लिये, आपको कथित रूप से किसी नुक़सान से बचाने के लिये हस्तक्षेप करता है। 
  • कुछ लोग आपके मामले में हस्तक्षेप करके अपना महत्व दिखाना चाहते हैं। अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं, नियंत्रण करना चाहते हैं। 
  • वे अपने किसी लाभ या फ़ायदे या हित के चलते हस्तक्षेप करते हैं। जैसे कई बार लोग अपने आर्थिक लाभ के लिये दख़लंदाज़ी करते हैं। 
  • कोई दूसरों के ध्यान का केंद्र बिन्दु बनने के लिये ऐसा कुछ करता है जो किसी के मामले में दख़ल बन जाता है। 
  • कभी कभी कुछ लोग अपना आत्मविश्वास, अपना मान सम्मान बढ़ाने अपनी अल्प प्रतिष्ठा को बचाने के लिये भी दख़ल देते हैं। 
  • कोई कभी कभी लोगों के समूह में खुद को शामिल रखने के लिये बीच बीच में कूदने लगता है ताकि वो भी उस समूह का हिस्सा बन जाये। 
  • कुछ लोग बहुत ज़्यादा अहंमन्य होते हैं जो पूरा नियंत्रण, सारी प्रशंसा, सारा श्रेय, सारी उपलब्धियों पर अपना ही दावा ठोकना चाहते हैं।
  • कुछ लोग भावनात्मक रूप से कमज़ोर पड़ने, व्याकुलता, तनाव या अन्य भावनात्मक चुनौतियों में खु़द को समायोजित करने के लिये दूसरों के मामले में टांग अड़ाने लगते हैं। 
  • किसी किसी ने अतीत में जो मानसिक झटका खाया होता है, जिस अवसाद से वो गुज़रा होता है उससे खुद को उबारने के लिये वो दूसरों के जीवन में अपना दखल बढ़ा देता है। 
  • व्यक्ति किस आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक पृष्ठभूमि से आता है इसका भी प्रभाव पड़ता है। पश्चिमी देशों में लोग अपने काम से काम रखते हैं, और हमारे समाज में लोग अपना काम छोड़कर अन्य सभी के काम से काम रखते हैं। 
  • कुछ लोग दूसरों के जैसे दोस्तों, परिवार, समाज आदि के दबाव में होते हैं और स्वयं को एक अच्छा दोस्त, परिजन या शुभचिंतक सिद्ध करने के लिये ऐसे मामले में हस्तक्षेप करते हैं जिसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। 
  • कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें निजी दायरे की समझ नहीं होती, वे किसी के भी जीवन में घुसते चले जाते हैं। 
  • कुछ लोग बहुत ही जिज्ञासु होते हैं, अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिये वे दूसरों के मामले में टांग अड़ाने लगते हैं।
  • किसी किसी को ये समझ ही नहीं आता कि जो व्यवहार उसके हिसाब से अच्छा है वो दूसरे के हिसाब से बहुत हस्तक्षेप करने वाला हो सकता है। 
  • कोई आदमी बोर होने के कारण या निरूद्देश्य सा ही दख़ल देने लग जाता है, जिस बात से उसका कोई वास्ता ही नहीं होता। वो अपने जीवन का अर्थ तलाश करने के लिये दूसरों को उंगली करने लगता है। 
  • कुछ लोगों को दूसरों के मामले में टांग अड़ाने, हस्तक्षेप करने दख़लंदाज़ी करने की आदत पड़ जाती है। 
  • कई बार किसी व्यक्ति के हस्तक्षेप करने के पीछे इनमें से एक से अधिक कारण भी हो सकते हैं। 
  • कभी कभी हम सोचते हैं कि हम इस मामले को निपटा सकते हैं, या हम स्वयं को विशेषज्ञ या सक्षम मानकर हस्तक्षेप करते हैं। कभी किसी बात का समर्थन करके, कभी किसी बात का विरोध करके हम अक्सर दख़लंदाज़ी करते ही रहते हैं। 
  • जो व्यक्ति आपका जितना क़रीबी होगा, जिससे आपका जितना अधिक वास्ता होगा उसके मामले में आप उतनी जल्दी और उतना अधिक दख़ल देंगे। 

दखल देने वालों का क्या करें?

लोगों के व्यवहार को देखिए, समझिये। ऊपर जो तरीके बताए गए हैं दखल करने के उनको खोजिए कि कौन ऐसा कर रहा है। उन कारणों को जानने की कोशिश कीजिये । लोगों के स्वार्थ के छुपे हुए दांत पहचानने की कला सीखिए। लोगों के हस्तक्षेप का मक़सद जानिए। सोचिए कि इस व्यक्ति के हस्तक्षेप से मामला किस दिशा में जा सकता है? 

दखल देने वाले से आपके संबंध, प्रभाव और स्थिति से तय होता है कि आप उसका कितना प्रतिरोध कर पाएंगे। जहां हम सीधा प्रतिरोध नहीं कर सकते वहां विषयांतर करना एक अच्छी रणनीति होती है। 

लोगों के लिए सीमा निर्धारित कीजिये। बिना हिचक लोगों को विनम्रता से सीधे या संकेतों में बोल दीजिए कि अपने काम से काम रखें। कुछ लोगों का दखल अक्सर आपकी मदद करने होता है, जैसे शिक्षक, माता पिता भाई बहन दोस्त, जो आपको सही दिशा में ले जाना चाहते हैं और गलती, चूक, नुकसान से बचाना चाहते हैं। 

आपको जीवन भर दूसरों के दख़ल का सामना करना पड़ेगा और दूसरों के जीवन में दख़ल देना पड़ेगा, बस इसकी कम से कम क़ीमत आपको चुकानी पड़े वो तरीक़ा खोजने की ज़रूरत होगी। 

Wednesday, 27 November 2024

असली अच्छे और ढोंगी अच्छे लोगों को कैसे पहचानें?


                                                            @ मन्यु आत्रेय 

            अगर आपने हिंदू वांग्मय को पढ़ा है तो आप जानते होंगे कि रावण ने ब्राम्हण साधु बनकर सीता माता का हरण किया था। पूतना कान्हा को दूध पिलाकर मार देना चाहती थी। ऐसे ही आपके जीवन में भी कई ऐसे लोग आते हैं जो अच्छे होते तो नहीं है लेकिन अच्छे आदमी होने का दिखावा करते हैं। इनका मक़सद आपको किसी न किसी प्रकार का धोख़ा देना होता है, फिर चाहे उससे आपको कोई नुक़सान ही क्यों न हो जाये। 

            लोग नहीं चाहते कि आप जानें कि वो असल में कैसे हैं? हर व्यक्ति के कुछ ऐसे पहलू होते हैं जो वो किसी की जानकारी में नहीं आने देना चाहता। जब लोग किसी व्यक्ति की नकारात्मक असलियत को जान जान जाते हैं तो उससे दूरी बना लेते हैं, सतर्क हो जाते हैं, आत्म रक्षा के रास्ते खोजने लगते हैं, इससे उनका काम बिगड़ जाता है इसीलिये भेड़िया भेड़ की खा़ल पहन कर आता है। 

वाक़ई अच्छे व्यक्ति कैसे होते हैं? 

            अगर आप एक संवेदनशील व्यक्ति हैं और दूसरों को महसूस कर सकते हैं तो आपको अनुभव हुआ होगा कि जो इंसान वाक़ई अच्छा होता है उससे अलग ही तरंगें उठती हैं। 
            अच्छे व्यक्ति के शब्दों और उसके आचरण में कोई अंतर नहीं दिखता यानी मुंह में राम बग़ल में छुरी वाली स्थिति नहीं होती। अच्छे लोग इस बात से वास्ता रखते हैं कि दूसरे क्या महसूस कर रहे हैं क्या सोच रहे हैं। वे सच्ची परवाह करते हैं। अच्छे लोग आपकी बातों को गंभीरता से सुनते समझते हैं, ज़रूरत पड़ने पर आपसे वे स्थिति को स्पष्ट करने को भी कह सकते हैं। 
            अच्छे लोग आमतौर पर अपनी उपलब्धियों के अहंकार से किसी को नीचा दिखाने की कोशिश नहीं करते। वे आपसे झूठ नहीं बोलते। विनम्र बने रहते हैं। वे अपने शब्दों, अपने कामों की पूरी ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हैं और ग़लत हो जाने पर माफ़ी भी मांग लेते हैं। वे किसी की हैसियत, आर्थिक-सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं करते और सभी को यथोचित सम्मान देते हैं। 
            अच्छे लोग जो हैं वो ही बने रहते हैं, जो वे नहीं हैं वो बनने का ढोंग नहीं करते। अच्छे लोग अपने छुपे हुए मक़सद के लिये किसी को नुक़सान पहुंचाने का प्रयास नहीं करते। अच्छे लोग अच्छा बनने की कोशिश नहीं करते वे होते ही अच्छे हैं। अच्छा होने का मतलब हर परिस्थिति में सभी के प्रति अच्छा होना होता है, परिस्थिति के थोड़ा विपरीत होते ही उनकी अच्छाई खो नहीं जाती। 

अच्छा होने का ढोंग करने वालों को कैसे पहचानें? 

            अच्छा होने का ढोंग करने वाले लोगों की पहचान करने का सबसे सरल तरीक़ा है उन पर ध्यान रखना, उनके शब्दों, उनके आचरण, उनके व्यवहार और आदतों पर लगातार ध्यान रखने से हमें समझ आ सकता है कि ये व्यक्ति जो बोलता है वैसा करता नहीं है। इसके शब्दों और आचरण में एक बड़ा अनुत्तरित सा अंतर है। 
            अच्छा होने का ढोंग करने वाले लोग अधिक समय तक उस अभिनय को जारी नहीं रख सकते। वे लोग अपना व्यवहार लगातार बदलते रहते हैं। अपने मक़सद को पूरा करने के लिये वे लोग चिकनी चुपड़ी बातें करने, अत्यधिक प्रशंसा करने, झूठी तारीफ़ करने से बाज़ नहीं आते। वे दिमाग़ी खेल खेलते दिखते हैं। 
            वे अपनी अच्छाई का हर जगह विज्ञापन करते नज़र आ सकते हैं। वे दूसरों का ध्यान खींचने और अपने कामों, व्यवहार और व्यक्तित्व की प्रशंसा अनुशंसा पाने का प्रयास करते रहते हैं, यानी उन्हें हमेशा एक अच्छा आदमी होने का प्रमाणपत्र चाहिये होता है। 
            उनमें दूसरों के दुख दर्द, वेदना, कष्ट, असुविधा, परेशानियों, समस्याओं के प्रति सच्ची संवेदना नहीं होती और वे दुख प्रदर्शित करने के अगले ही क्षण मुस्कुरा भी सकते हैं। वे दूसरों से कभी भी पूरी तरह से जुड़ते नहीं हैं। वे संकट, परेशानी या चुनौती के समय अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेते हैं, कोई चूक या ग़लती हो जाने पर उसका दोष किसी न किसी दूसरे व्यक्ति पर मढ़ने का प्रयास करते हैं और शुरू से इसकी पृष्ठभूमि तैयार करते रहते हैं। अपनी कमियों को छुपाकर दूसरों की कमियों को उजागर करने की कोशिश करते हैं। वे जो नहीं हैं वैसा दिखने की कोशिश करते हैं। वे अपराध बोध, क्रोध, आत्म दया, विक्टिम कार्ड जैसी युक्तियों से दूसरों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। वे हमेशा बदले में कुछ ना कुछ हासिल करने की कोशिश करते दिख सकते हैं. 

कब सतर्क हो जाना चाहिये? 

            ऐसे फ़र्जी़ अच्छे लोगों से तो हमेशा ही सतर्क रहना चाहिये, लेकिन कभी कभी कुछ लोग अपने जीवन की बहुत सारी बातें दूसरों से साझा नहीं करना चाहते, इसके पीछे उनका मक़सद सिर्फ़ अपनी निजता की रक्षा करना होता है और कुछ नहीं। परंतु अक्सर अच्छा बनने का नाटक करने वाले लोगों के कुछ गुप्त उद्देश्य होते हैं। वे तब तक अच्छे बने रहते हैं जब तक कि उनका उद्देश्य पूरा न हो जाये, या फिर उस उद्देश्य के पूरा होने की संभावना ही समाप्त न हो जाये। ऐसे अच्छे लोगों को पहचाना जा सकता है। 
            कोई भी ‘अच्छा’ व्यक्ति आपकी ज़रूरत के समय तो नदारद हो जाये लेकिन जब जब उसे ज़रूरत हो वो बिना हिचक आपके पास आ जाये। जब कोई व्यक्ति बहुत जल्दी जल्दी अपने मनोभावों को बदलता हुआ दिख रहा हो, खासकर जब उसके किसी भी एक मनोभाव का संबंध आप से हो, उदाहरण के लिये आप दुखी हैं और वो भी दुखी दिख रहा है लेकिन अगले ही क्षण किसी और से मिलने पर वो उसके साथ हंस हंस कर बातें कर रहा हो तो समझ लें कि उसकी संवेदना उतनी सच्ची नहीं थी। 
            अगर वो अच्छा आदमी दूसरो के बारे में अफ़वाहें फैलाते, झूठ बोलते, व्यंग्यात्मक बातें कहता हुआ दिखे तो सतर्क हो जाईये क्योंकि वो आपकी पीठ पीछे भी यही आपके लिये करेगा। 
            यदि कोई अच्छा आदमी आपसे आपके जीवन के बारे में, आपके किसी खा़स काम के बारे में खोद खोद कर जानकारी लेने की कोशिश करे, आपको बार बार भरोसा दिलाये कि आप उस पर निर्भर हो सकते हैं, तो उससे भी सतर्क रहिये। ऐसा ‘अच्छा’ व्यक्ति यदि आपको अनावश्यक रूप से ज़्यादा समय दे, सहायता का हाथ बढ़ाये तो समझिये कि उसके कुछ उद्देश्य हो सकते हैं। हो सकता है वे उद्देश्य आपके लिये नुक़सानदेह न भी हों या हो भी सकते हैं।
            ‘अच्छा’ व्यक्ति आपसे क्रमशः बढ़ती हुई रक़म उधार ले रहा हो, यानी पहले 1000 लिया और वापस कर दिया, फ़िर 5000 रू. मांगे और वापस कर दे, फिर 10000 रू. मांगे और वापस कर दे तो सतर्क हो जाईये शायद वो अगली बार 1 लाख रूपये मांगे और कभी भी वापस न करे। 

ऐसे ‘अच्छे’ लोगों से कैसे निपटें? 

ऐसे ‘अच्छे’ लोगों से निपटा जा सकता है हालांकि उनकी असलियत की पहचान करना उतना आसान काम नहीं है लेकिन अगर आप कुछ रणनीतियों पर काम करते हैं तो उन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है और समुचित क़दम उठाया जा सकता है। 
1. उनके व्यवहार, शब्दों, हाव भाव और कामों में अंतर खोजिये। 
2. ये समझने की कोशिश कीजिये कि वे अच्छा बनने का नाटक क्यों कर रहे हैं? 
3. उनके बारे में जानकारी जुटाईये, उनके ग्रे एरिया को प्रकाश में लाईये। 
4. उन्हें समझा दीजिये कि उनसे आपकी अपेक्षा क्या है और आपकी सीमा क्या है? 
5. उन्हें यह संकेत भी किया जा सकता है कि अच्छा बने रहने का ढोंग करने के क्या परिणाम हो सकते हैं? 
6. किसी भी भावनात्मक खेल में उलझिये मत, भावुक प्रतिक्रियायें मत दीजिये। 
7. स्वयं को प्राथमिकता पर रखिये, अपने भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले नकारात्मक लोगों को स्वयं से दूर कीजिये। 
8. अपनी बातों में स्पष्टता और दृढ़ता रखिये, यदि वो सोच रहा है कि आपको बेवकूफ बना लेगा तो उसे धक्का लगेगा और वो औक़ात में रहेगा।
9. उसकी बातों पर यदि आपको कुछ जिज्ञासा, शंका, अस्पष्टता लगे तो उससे प्रश्न करके स्पष्ट हो जाना चाहिये कि उसकी दाल नहीं गलेगी। 
10. ऐसे ‘अच्छे’ आदमी की किन्हीं अस्पष्ट बातों को स्पष्ट  करवा लेने की आदत डालिये। 
11. लोगों से एक सुरक्षित दूरी बना कर ही चलना चाहिये। उन पर बहुत अधिक भावनात्मक निर्भरता नहीं रखनी चाहिये और न ही बहकना चाहिये।
12. जिन पर भी आपको ढोंगी होने का शक़ हो उनसे धीरे धीरे दूरी बना लीजिये और जो लोग आपको सच्चे और साफ़ सुथरे लगते हों उनसे संपर्क रखिये। 
13. ऐसे अच्छे व्यक्ति पर शंका होने पर ठोस और आत्मविश्वास से भरा हुआ व्यवहार रखिये, ताकि उन्हें आपको ठगना आसान न लगे। 
14. अपने भरोसे के लोगों, परिवार वालों, दोस्तों से इस बारे में बात कर सकते हैं। 
15. ध्यान से अवलोकन, धैर्य, सही समय पर सही प्रतिक्रिया देना सीखिये। 

अच्छा होने का ढोंग करने वाले लोगों के चक्कर में कई बार हम सच में अच्छे लोगों की उपेक्षा कर देते हैं, उनसे दूर हो जाते हैं, इससे हमारा दोहरा नुक़सान हो जाता है, इसलिये ढोंगी अच्छे लोगों को अपने जीवन में सीमित स्थान दीजिये।

Tuesday, 26 November 2024

एटीट्यूड दिखाने वालों का क्या किया जाये?

एटीट्यूड दिखाने वालों का क्या किया जाये?
@ मन्यु आत्रेय
एटीट्यूड दिखाने वाले लोग अक्सर किसी को पसंद नहीं आते, पता नहीं अजीब सी चिढ़ सी लगती है ऐसे लोगों को देखकर। हम सभी ने कभी न कभी ऐसे लोगों का सामना ज़रूर किया होगा। शायद हम भी किसी की नज़रों में एटीट्यूड दिखाने वाले हो सकते हैं। कभी कभी हम सामने वाले के व्यक्तित्व और व्यवहार को समझ नहीं पाते और उन्हें एटीट्यूड दिखाने वाला समझ कर उनसे कट जाते हैं या उनके बारे में नकारात्मक धारणायें बना लेते हैं। 
बचपन में मेरी मित्र मंडली में दो तीन ऐसे दोस्त थे जो आपस मे ज़्यादा कम्फ़र्टेबल थे और हमसे थोड़ी दूरी सी ही बना के रखते थे। हम लोग उनको अकडू मानते थे, वो लोग थोड़ी अच्छी आर्थिक स्थिति वाले थे, वो अच्छे कपड़े पहनते थे, अच्छे खिलौनों से खेलते थे, साफ सुथरे तो हमसे ज्यादा ही रहते थे, और उन पर उनके घर वालों का बड़ा प्रभाव था। आंख के एक इशारे पर हमसे तुरंत दूर हो जाते थे। शायद उनके घरवालों ने उन्हें ये कहा होगा कि दूसरे बच्चों के साथ बहुत घुल मिल कर नहीं खेलना है, थोड़ा दूरी बना के रखना है। बरसो बाद धीरे धीरे ये समझ आया कि वो लोग एटीट्यूड दिखाते थे। 

एटीट्यूड दिखाने को कैसे पहचानें?

सरल हृदय लोगों को अक्सर समझ नहीं आता कि सामने वाला एटीट्यूड दिखा रहा है। पहले मैं सोचा करता था कि लोग ऐसे ही होते हैं, जैसा वे व्यवहार करते हैं। मैं लोगेां के एटीट्यूड दिखाने को समझ नहीं पाता था, बाद में जीवन में कई लोगों के व्यवहार को देखकर यह महसूस हुआ कि सामने वाला तो एटीट्यूड दिखा रहा है। एटीट्यूड दिखाना वैसे एक नकारात्मक, अपमानजनक और असहयोगी व्यवहार प्रदर्शित करने को कहते हैं। 
हम लोगों के शब्दों, उनकी देह भाषा, उनके हाव भाव से समझ सकते हैं कि कौन एटीट्यूड दिखा रहा है। 

इसे कुछ लक्षणों से हम समझ सकते हैं-
1. व्यंग्यात्मक लहज़ा, मज़ाक उड़ाना या तिरस्कारपूर्ण लहज़ा इस्तेमाल करना।
2. अपमानजनक भाषा, गाली-गलौज, अपमान करना 
3. टकराव पैदा करने वाली बात या टिप्पणी करना। 
4. हाथ बांध कर, कमर पर हाथ रखकर आक्रामक मुद्रा बनाना, तैश दिखाना।   
5. आँखें घुमाना या मुँह फेर लेना, मुंह बनाना।
6. भौंहें सिकोड़ना या भौंहें ऊपर उठाना।
7. अतिरिक्त मात्रा में ज़हरीली हंसी हंसना, 
8. डायरेक्ट आई कॉन्टैक्ट से बचना या फिर आक्रामक तरीके से देखना। 
9. हाथों की चीजा़ें को जोर देकर रखना। 
10. देख कर भी नहीं देखना। 
11. अनादर करना, दूसरों की राय या भावनाओं को नज़रअंदाज़ या खारिज करना।
12. दूसरों से नीचा दिखाना या ज़बर्दस्ती संरक्षण देने की कोशिश करना। 
13. दूसरों पर जिम्मेदारी या दोष मढ़ना
14. दूसरों को उनकी धारणाओं या विवेक पर संदेह करने के लिए प्रेरित करना।
15. आक्रामक या अपमानजनक टिप्पणियॉं या संदेश करना। 

क्या सच में वो एटीट्यूड दिखा रहे हैं?
कई बार हम ग़लत समझ जाते हैं। एक व्यक्ति पर हम एटीट्यूड दिखा रहा है का लेबल लगा तो देते हैं जबकि ऐसा होता नहीं है। 
1. दरअसल लोगों में सभी के बातचीत की शैली बहुत अलग होती है। अलग अलग सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोगों की कम्यूनिकेशन स्टाईल अलग अलग होती है। हो सकता है कि हम उनकी शैली को ठीक से समझ नहीं पाये हों। 
2. अलग अलग संस्कृतियों में आंखों से देखने के अंदाज़, शारीरिक स्पर्श या कुछ प्रकार के हाव भाव को अनादर करने वाला समझा जा सकता है या फिर मैत्रीपूर्ण। इससे भी धोखा हो सकता है। 
3. लोगों के संेस ऑफ़ ह्यूमर यानी हास्य बोध में काफी़ अंतर हो सकता है। इसके चलते ग़लतफ़हमियॉं पैदा हो सकती है। आप उसके सरकाज्म को नहीं समझ पाये तो आप उसे ग़लत समझ सकते हैं। 
4. कभी कभी किसी व्यक्ति का एटीट्यूड किसी परिस्थिति का परिणाम होता है जैसे चिंता, संकट या बड़ी चुनौती या समस्या का सामना कर रहे व्यक्ति का व्यवहार थोड़ा बदल जाता है, वो दूसरों से दूरी बना सकता है। 
5. डिप्रेशन का शिकार आदमी भी अपने व्यवहार के चलते गलतफहमी का शिकार हो सकता है। 
6. जिनका इमोशनल कोशेंट कम होता है वे लोग भी दूसरों को सही तरीके़ से नहीं समझ पाते हैं। 
7. कई बार लोगों के पास समय कम होता है, या स्थितियॉं संवेदनशील होती है तो वे सही तरीके से व्यवहार नहीं रख पाते और हमें लगता है कि वो एटीट्यूड दिखा रहा है। 
8. हो सकता है कि माहौल ऐसा हो कि हम सामने वाले व्यक्ति के व्यवहार को ठीक से आंक न सकें। 
9. कई बार हमारे खुद के कुछ पूर्वाग्रह होते हैं, हमारी धारणा होती है, हम मान कर चलते हैं कि ये तो बड़ा एटीट्यूड दिखाता है, दिखा रहा है या दिखायेगा। 

लोग एटीट्यूड क्यों दिखाते हैं?
ज़्यादा एटीट्यूड दिखाने वाले किसी को पसंद नहीं आते। वैसे अधिकांश लोग कभी न कभी किसी न किसी के सामने एटीट्यूड दिखाते ही हैं। एटीट्यूड दिखाने के कई कारण होते हैं। कुछ लोग अपनी असुरक्षा और हीन भावना को छुपाने के लिए इसे अपने बचाव तंत्र के रूप में इस्तेमाल करते हैं। 
कुछ लोगों के लिये यह डर, चिंता या तनाव से निपटने के लिए एक उपाय बन जाता है। वहीं अनसुलझी या दबी हुई भावनाओं को व्यक्त करने के तरीके के रूप में एटीट्यूड सामने आता है। वहीं कभी कभी आदमी डिप्रेशन में या बाइपोलर डिसऑर्डर के कारण ऐसा व्यवहार करता है। 
कुछ परिवारों में एटीट्यूड दिखाना खून में ही होता है। लोग अपने परिवार से ही सीखते है। मैं बहुत ही धनाढ्य लोगों की एक पार्टी में गया था, मुझे लगा कि सुपर रिच लोगों की संस्कृति में ही एटीट्यूड दिखाना शामिल हो जाता है। सुरक्षा संबंधी ड्यूटी के दौरान एक अधिकारी अपने आप मे बहुत खो गया था और उसके व्यवहार से लग रहा था कि वो एटीट्यूड दिखा रहा है, उसका कारण शायद उसकी ड्यूटी का तनाव रहा होगा। 
कभी कभी पीयर प्रेशर यानी साथियों के दबाव के कारण एटीट्यूड दिखाना पड़ता है। हमारा व्यवहार असल मे स्वयं को अभिव्यक्त करने का तरीका होता है। जिन लोगों का कम्युनिकेशन स्किल अच्छा नहीं होता, वे खुद को अच्छे से अभिव्यक्त नहीं कर पाते। मेरे एक गायक मित्र किसी भी महफ़िल में लोगों से ज़्यादा बात नहीं करते क्योंकि उन्हें लगता है कि मैं बात करूंगा तो लोग मेरे गाने की कमी बेशी न गिनाने लगें।  यह उनकी रक्षा युक्ति है। 
मेरे एक अकडू परिचित ने बातों बातों में ये जता दिया कि वो हमेशा अपनी अड़ी में यानी एटीट्यूड में इसलिए रहता है ताकि वो संबंधों में अपर हैंड स्थिति में रहे। यानी कुछ लोग नियंत्रण बनाये रखने के लिए भी एटीट्यूड दिखाते हैं। 
मेरा एक दोस्त जो बहुत ही जॉली नेचर का था वो अपने ब्रेक अप के बाद डिप्रेशन में चला गया और उससे उबरने के बाद बहुत खडूस हो गया और बड़ा एटीट्यूड दिखाने लगा। शायद कुछ लोग अपने पुराने बुरे अनुभव और अनसुलझे मामलों को झेलने के बाद थोड़े बदल जाते हैं और उनका एटीट्यूड बदला हुआ दिखता है। 
बहुत सारे लोग ये कभी नहीं समझ पाते कि उनके व्यवहार को दूसरे लोग एटीट्यूड दिखाना मानते है। उनमे खुद के प्रति जागरूकता की कमी होती है। वो समझ नहीं पाते कि उनके रवैये के दूसरों पर कैसा प्रभाव पड़ रहा है। लंबे समय तक अगर उन्हें इस के बारे में चेताया नहीं जाए तो फिर वो व्यवहार जड़ जमा लेता है और आदत बन जाता है। 
कुछ लोग सिर्फ दूसरों की नक़ल करते हुए कूल बनने के लिए एटीट्यूड दिखाते हैं। एक आंटी जो एक बीमारी से जूझ रही थीं उनके व्यवहार में एक चिड़चिड़ापन और हताशा थी, सीधे मुंह जवाब नहीं देती थी। जो लोग निरंतर कष्ट भोगते हैं उनमें से कई लोगों का व्यवहार थोड़ा रूखा हो जाता है।

क्या किया जाये एटीट्यूड दिखाने वालों के साथ?
एटीट्यूड दिखाने वाला यदि हमारा बहुत क़रीबी है, बहुत काम का है तो हमें शायद उसके एटीट्यूड को सहन करना पड़ेगा। यदि वो हमारा कोई खास नहीं है, हमें उससे अधिक वास्ता नहीं है तो फिर हम उसकी उपेक्षा कर सकते हैं। परंतु यदि कोई ऐसा है जो हमारे रोज़मर्रा के जीवन से किसी न किसी महत्वपूर्ण रूप से जुड़ा है तो हमें उसके प्रति एक रणनीति के साथ काम करना होगा, अन्यथा रोज़ हमारा ही खून जलेगा। 
इसलिये सबसे पहले हमें ये सुनिश्चित करना चाहिये कि सामने वाला सच में एटीट्यूड दिखा रहा है या फिर उसका स्वभाव, व्यवहार और व्यक्तित्व ही ऐसा है। अगर यह स्पष्ट हो जाये कि ये एटीट्यूड दिखा रहा है तो हमारे पास तीन रास्ते होते हैं, पहला-उसकी उपेक्षा करके आगे बढ़ जाना, दूसरा उससे लड़ने भिड़ जाना और तीसरा, उसे उसके व्यवहार को स्पष्ट करने के लिये कहना ताकि हम समझ पायें और वो भी जान पाये कि उसके व्यवहार का हम पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। 
हमें एक्टिव लिसनिंग यानी सक्रिय रूप से सुनना चाहिये, उसके शब्दों, उसके हाव भाव, उसकी देह भाषा को समझना चाहिये। उस पृष्ठभूमि को समझना चाहिये जिसमें वे बातें हो रही हैं। उसकी जो भी बातें आपको ठीक न लगे, या समझ न आयें तो उससे स्पष्टीकरण वाले प्रश्न कीजिये ताकि वो अपनी स्थिति को स्पष्ट कर सके। यदि वो ऐसा नहीं कर पाता तो बचे हुए दो विकल्प आपके पास हैं ही। 

आप सोचिये कि इसके इस एटीट्यूड वाले व्यवहार को और किस एंगल से देखा जा सकता है? ये भी सोचिये कि इस आदमी का धर्म, जाति, संप्रदाय, क्षेत्र, संस्कृति आदि सामाजिक कारकों के अनुरूप तो इसका व्यवहार नहीं है? सामने वाले व्यक्ति के बारे में धारणायें बनाने या किसी निष्कर्ष पर कूदने से बचना चाहिये।  
हम अक्सर दूसरों को ग़लत समझ लेते हैं। अगर वो एटीट्यूड दिखा रहे हों तो भी और नहीं दिखा रहे हों तो भी, हमें अपना एटीट्यूड सही रखना होता है। वो चाहे जैसे भी हैं, हम कैसे हैं ये हमें पता है और यही हमें अपने व्यवहार से प्रकट भी करना होता है।

एटीट्यूड वाले व्यक्ति अपना नुक़सान खु़द करते हैं। उनसे संघर्ष करने की बहुत ज़रूरत नहीं होती है। अतः ऐसे व्यक्ति के व्यवहार को पहले ध्यान से देखिये, समझिये, तय कीजिये कि मुझे क्या करना चाहिये और फिर उसके अनुरूप काम कीजिये। याद रखिये कि मन की शांति से बड़ी संपत्ति और कोई नहीं होती और किसी व्यक्ति के एटीट्यूड वाले व्यवहार पर इसे बर्बाद नहीं किया जा सकता।

मैं आज का दिन पूरे बोध में जीऊँगा

मैं आज का दिन पूरे बोध में जीऊँगा   आज मैं एक संकल्प के साथ उठता हूँ— मैं आज का दिन पूरे बोध में जीऊँगा।  कल की स्मृतियाँ और कल की चिंताएँ द...