लोग अक्सर पूरा सच नहीं बताते, सच के सारे आयाम नहीं दिखाते,
आपको एक बीज के भीतर छुपे हुए पेड़ को पहचानना पड़ता है।
लोग अक्सर सिर्फ उतना ही बताते हैं
जितना जानना उनके अनुसार आपके लिए ज़रूरी हो,
या वो आपको ज़्यादा जानने के लायक नहीं समझते हैं
या उन्हें लगता है आप पूरी बात समझ नहीं पाएंगे,
या आपका और उनका हित अहित कहीं न कहीं आड़े आ जाता है
या उनके भीतर कोई अपराध बोध होता है, जिससे वो बाहर भी आना चाहते हैं और उसके संभावित परिणाम से बचना भी चाहते हैं
लोग इसलिए भी पूरा सच आपको नहीं बताते क्योंकि आपकी स्थिति,
उनसे आपके संबंध और आपकी सोच उन्हें रोक देती है
वो अनिश्चितता में होते हैं कि पता नहीं आप क्या कैसी प्रतिक्रिया देंगे
आधा सच असल में झूठ के बराबर ही होता है
जैसे गाय दूध नहीं देती बल्कि निकालना पड़ता है
वैसे सत्य को भी निकालना पड़ता है
पूरा सच मंथन के बाद निकलता है जैसे दही को बिलोने से मक्खन निकलता है
कौन कितना सच बोल रहा है इसको एकबारगी जाना नहीं जा सकता,
विश्वास और भरोसा भी कोई चीज़ होती है, लेकिन भरोसे में ही धोखे के बीज छुपे होते हैं
कुछ लोग आधा सच इसलिए बताते हैं ताकि उनका काम बन जाये
कुछ लोग थोड़ा सच इसलिए बताते हैं ताकि बाकी का आप खुद पता कर लें,
कुछ लोग आधा सच इसलिए बता देते हैं क्योंकि वो आपके खिलाफ चलाये जा रहे षड्यंत्र का एक अहम भाग होता है,
आधा सच किसी की 'अपने बचाव की युक्ति' भी होता है
आधे झूठ आधे सच का कॉकटेल बड़ा घातक बनता है, जो चखता है, उसके होश बाद में फाख्ता होते ही हैं
सच कौन, कब, कैसे, कितना और क्यों बता रहा है यह बहुत मायने रखता है
आधे सच के केंद्र में आपका हित है तो सामने वाला शायद आपका भला चाहता है, या खुद को आपका हितैषी बताना चाहता है
आधे सच के पीछे सामने वाले का हित छुपा हुआ हो तो यह ध्यान देने वाली बात है
आधे सच पर आधारित निर्णय लेना उतना ही सुरक्षित है
जितना दरवाजे के एक किवाड़ को खुला छोड़कर दूसरे में ताला लगा देना,
यह दुनिया स्वार्थी, डरपोक, और लालची लोगों से भरी हुई है
लोग सच को तोड़ मरोड़ कर अपना उल्लू सीधा करने के उस्ताद हैं
सच को इतना जटिल तरीके से पेश किया जाता है कि आप
जितना सामने है उसी में उलझे रहें और बाकी की तरफ न ध्यान दें
मासूमियत और भरोसमंद चेहरा छुपाए गए सच का नक़ाब हो जाते हैं,
आपका खैरख्वाह बनने का दम भरने वाला भीतर से अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित होता है
सतर्क रहो, सजग रहो, किसी के द्वारा उद्घाटित सच को पूरा मत मानो।
सच के आयाम और विमाएं तलाशो। पुष्टि करो।
सवाल करो, अस्पष्ट हिस्सों को स्पष्ट करो।
गोल गोल और द्विअर्थी शब्दावली के निश्चित अर्थ पूछो।
सामने वाला कहीं न कहीं ज़रूर उलझ जाएगा, वैकल्पिक सच भी तलाशो।
हो सकता है आधा सच आपके लिए सुविधाजनक हो, और पूरा सच आपके जीवन में खलल पैदा कर दे
परंतु उसके जान लेने से आप खुद को बेहतर तरीके से तैयार कर सकते हैं
पूर्ण सत्य ही शिव है और वही कल्याणकारी है और वही सुंदर है।
@मन्यु आत्रेय
सत्यम शिवम् सुंदरम 💐💐💐
ReplyDeleteNice
ReplyDeleteBehtareen sir👌👍💐💐💐
ReplyDelete👌👌🙏💐
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