नाता और रिश्ता दो अलग अलग बातें हैं
रिश्ता वो स्थिति है जिसमें दो लोग किसी भी रूप में जुड़ा हुआ महसूस करते हैं
भले ही उनमें कोई औपचारिक नाता हो या नहीं हो,
नाते औपचारिक होते हैं नातों को सामाजिक मान्यता होती है
पति पत्नी, भाई बहन चाचा मामा आदि समाज के औपचारिक नाते होते हैं
अगर नाता बाहरी ढांचा है तो रिश्ता उसका अंदरूनी भाग है।
हर रिश्ते को सामाजिक मान्यता हो ये ज़रूरी नहीं
रिश्ता परस्पर अच्छा हो तो नाते टिकते हैं वरना नाममात्र के रह जाते हैं।
रिश्ता अच्छा न हो तो भाई भाई का दुश्मन हो जाता है,
नई नई शादी में तलाक़ हो जाता है।
बेटा बहू बूढ़े माँ बाप को छोड़ कर दूर जा बसते हैं
या लोग उम्र भर ऐसे नातों को ढोते रहते हैं जिनमे रिश्ता कब का मर चुका होता है
रिश्ते को मजबूती मिलती है परस्पर जुड़ाव से, अपनापन होने से, एक दूसरे के साथ खड़े होने से,
परवाह से, प्रेम से, विश्वास से, सम्मान से, एक दूसरे पर निर्भर होने से, एक दूसरे को समय देने से।
जब ये सब एक रिश्ते में होता है तो वहां वास्ता प्रबल होता है
वास्ता प्रबल होता है तो रिश्ते मज़बूत रहते है रिश्ते अच्छे हों तो नातों का कोई अर्थ रहता है
दो लोगों के आपस में जो संबंध होते हैं उससे तय होता है कि इस रिश्ते में कितनी जान है
किसी के लिए दिल मे जो तड़प होती है वही उससे हमारा वास्ता है
वास्ता नहीं हो तो करीबी नाते रिश्ते भी ताश के महल की तरह ढह जाते हैं।
अपने रिश्ते को प्रबल करने के लिए आपसी वास्ता बढ़ाइए
जिस रिश्ते में आपसी वास्ता बहुत प्रबल होता है
तो लोग एक दूसरे के लिए समाज से भी टकरा जाते हैं, मौत से भी लड़ जाते हैं
अपने संबंध में धीरे धीरे घट रहे वास्ते को पहचानिये, उसे बचाये रखने और बढ़ाने का प्रयत्न कीजिये
आपके रिश्ते कभी खराब नहीं होंगे!
@मन्यु आत्रेय
Bahut badhiya🌹
ReplyDeleteSach hai sir👌👌👍👍💐💐
ReplyDeleteVery nice sir👌💐💐🙏🙏
ReplyDelete🙏💕
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