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Saturday, 26 December 2020

बहुत कुछ बाकी है

नव कल्प

आज के दिन 
मुझे खुद को तैयार करना है
ये वक़्त बीत जाना है बहुत कुछ बाकी रह जाना है
कई बातें छूटती जानी हैं नई बातें जुड़ती जानी हैं
पुराने दोस्त पीछे छूट जाएंगे, नए जुड़ जाएंगे
कई रिश्ते मंद पड़ते पड़ते बुझ जाएंगे
कुछ नए दियों से टिमटिमाएंगे
पसंद अपनी केंचुली बदलती रहेगी
प्यारे लोग बिछड़ जाने हैं  कुछ मरासिम सुधर जाने हैं 
कई रास्तों पर चलना मुमकिन न होगा
कुछ मिलकर भी हासिल नहीं होगा
कई कल्पनाओं और सपनों को भंग होना है 
जाने कितने धोखे और छल पर दंग होना है 
पूरे न किये गए वादों के शूल चुभने हैं
कई कई दाग अपनी स्मृतियों के ढंकने हैं 
तेज़ रफ़्तार से दौड़ते कई बार रुकना है 
कभी पर्वत तो कभी राई के आगे झुकना है 
दर्द से कराहना है खुशी से चीखना है
अभी ज़िन्दगी में बहुत कुछ सीखना है 
मृगतृष्णा के पीछे भटकना है 
इच्छाओं को मासूम कली सा चटखना है
ज़िन्दगी की चकरघिन्नी में फिरना है
बार बार संभलना है, उठना है गिरना है 
कई सुबहे कई रातें बितानी है
अच्छाइयां और बुराइयां खुद को गिनानी हैं 
जैसे शराब न हो तो भी साकी रह जाता है
वैसे ज़िन्दगी में बहुत कुछ बाकी रह जाता है

@मन्यु आत्रेय

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